अभी है उम्मीद

जिंदगी न मिलेगी दुबारा

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माँ बहुत डर लगता है

Posted On: 20 Apr, 2013 में

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mdमाँ मुझे डर लगता है…

बहुत डर लगता है… माँ

सूरज की रौशनी आग सी लगती है

पानी की बूंदे तेजाब सी लगती हैं …

माँ हवा में भी ज़हर सा घुला लगता है .

माँ मुझे छुपा लो बहुत डर लगता है।।।

माँ याद है वो काँच की गुडिया जो बचपन में

टूटी थी …

माँ कुछ ऐसे ही आज मै टूट गयी हूँ ..

मेरी गलती कुछ भी ना थी

माँ फिर भी खुद से रूठ गयी हूँ …

माँ बचपन में स्कूल टीचर की गन्दी नज़रों से

डर लगता था।।।

पड़ोस के चाचा के नापाक इरादों से डर

लगता था।।।

माँ वो नुक्कड़ के लड़कों की बेखौफ़ बातों से डर

लगता था।।

और अब बॉस के वहशी इशारों से डर लगता है।।

माँ मुझे छुपा लो बहुत डर लगता है।।।

माँ तुझे याद है तेरे आँगन में चिड़िया सी फुदक

रही थी ..

ठोकर खा के मै जमीन पर गिर रही थी

दो बूँद खून की देख के माँ तू भीरो पड़ती थी

माँ तूने तो मुझे फूलों की तरह पला था

उन दरिंदों का आखिर मैंने क्या बिगाड़ा था क्यूँ

वो मुझे इस तरह मसल कर चले गए

बेदर्द मेरी रूह को कुचल कर चले गए ..

माँ तू तो कहती थी की अपनी गुडिया को मै

दुल्हन बनाएगी

मेरे इस जीवन को खुशियों से सजाएगी।।

माँ क्या वो दिन जन्दगी कभी ना लाएगी ..

माँ क्या तेरे घर अब बारात न आएगी …?

माँ खोया है जो मैंने क्या फिर से कभी न

पाऊँगी…?

माँ सांस तो ले रही हूँ

क्या जिन्दगी जी पाऊँगी …?

माँ घूरते हैं सब अलग ही नज़रों से ..

माँ मुझे उन नज़रों से छुपा ले

माँ बहुत डर लगता है मुझे आँचल में

छुपा ले …


साभार : आज मैनें ये कविता कही पढ़ा और जब मैनें इसे पढ़ा तो लगा की  आपको भी एक बेटी के दर्द से अवगत कराऊं . इसलिए मैंने ये कविता अपने ब्लाग में लिखा हैं.



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yogi sarswat के द्वारा
April 22, 2013

ठोकर खा के मै जमीन पर गिर रही थी दो बूँद खून की देख के माँ तू भीरो पड़ती थी माँ तूने तो मुझे फूलों की तरह पला था उन दरिंदों का आखिर मैंने क्या बिगाड़ा था क्यूँ वो मुझे इस तरह मसल कर चले गए बेदर्द मेरी रूह को कुचल कर चले गए .. माँ तू तो कहती थी की अपनी गुडिया को मै दुल्हन बनाएगी मेरे इस जीवन को खुशियों से सजाएगी।। माँ क्या वो दिन जन्दगी कभी ना लाएगी .. माँ क्या तेरे घर अब बारात न आएगी …? माँ खोया है जो मैंने क्या फिर से कभी न पाऊँगी…? बहुत सुन्दर !

jlsingh के द्वारा
April 21, 2013

आदरणीय लावण्या जी, सादर अभिवादन ! कविता है तो भाव विह्वल कर देने वाली! पर अब ऐसी कविताओं से काम नहीं चलने वाला! माँ के अंचल से निकल कर सामना करना होगा…. दुर्गा बन शत्रु का संहार करना होगा….. शस्त्र उठाना होगा.


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