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जिंदगी न मिलेगी दुबारा

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कोख में मार दिए जाते हैं बेटे!

Posted On: 1 Apr, 2013 में

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ppमैनें कुछ दिन पहले ये आलेख कहीं पढ़ा था. पढ़ कर लगा का की ये बाते आपको भी बताऊं.


पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने वाला राजस्थान अपने में कई रोचक तथ्य छुपाये हुए है. यहां कदम-कदम पर कई अनोखी परंपराओं को  देखा जा सकता है. देशभर में कन्या भ्रूण हत्या के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं, खासतौर से राजस्थान में इस तरह की घटनाएं काफी चर्चित रहीं हैं. लेकिन यदि कहा जाए कि इसी राजस्थान में एक कोना ऐसा भी है, जहां लड़कों को गर्भ में ही मार दिया जाता है. वहीं, लड़कियों के पैदा होने पर थाली बजाकर उनका स्वागत किया जाता है और खुशियां मनाई जाती हैं. तो आप को थोड़ा अजीब लगेगा पर ये सच हैं.


पश्चिमी राजस्थान के सीमावर्ती गावों में यह आम तौर पर देखा जाता है.राजस्थान के बाड़मेर जिले के सांवरड़ा, करमावास, सुइली, मजलव लाखेटा  आदि गांवों में यह परंपरा न जाने कब से चली आ रही है.  हालांकि, इस परंपरा के पीछे की छुपी हुई है एक ऐसी सच्चाई, जिसे समाज में घ़णा की दृष्टि से देखा जाता है, लेकिन यहां के शहरवासियों के लिए यह कमाई का प्रमुख जरिया है.


इन गांवों में कमाई के लिए औरतें जिस्मफरोशी करती हैं. इस धंधे से जुड़ी महिलाएं गर्भवती होने पर लिंग परीक्षण कराती हैं और यह देखती हैं कि गर्भ में लड़का है या लड़की. यदि गर्भ में लड़का हुआ तो उसे पैदा होने से पहले ही ख़त्म कर दिया जाता है, जबकि लड़की होने पर थालियां बजाकर स्वागत किया जाता है. लड़कियों का स्वागत इसलिए नहीं किया जाता कि उन्हें लड़कियों से प्यार है, बल्कि इसलिए किया जाता है, क्योंकि वे बड़ी होकर धंधे को आगे बढ़ाएंगी.


400 घरों की आबादी वाले करमावास,  सावरंड़ा क्षेत्र में मात्र 30 फीसदी ही पुरुष हैं. इस क्षेत्र में महिलाएं अपना जिस्म बेचकर परिवार का पालन-पोषण करती हैं. ऐसा नहीं है कि सरकार को इस क्षेत्र में चल रहे गलत धंधे के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन यहां एक NGO के अलावा कोई नहीं आया. करमावास और सावरंड़ा में एक ऐसी विशेष जाति की अधिकता है, जिसका काम ही वेश्यावृत्ति है. इस जाति की  महिलाएं और युवतियां सज-धज कर सड़क के किनारे बैठ जाती हैं और राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करती हैं. ग्राहक फंसते ही  मोल-भाव कर अपने जिस्म का सौदा करती हैं.


यह विशेष जाति साटिया  नाम से जानी जाती है.इस जाति में 15  से 45 साल तक की महिलाएं वेश्यावृत्ति में लिप्त होती हैं. इतना ही नहीं, इन परिवारों में पुरुष भी महिलाओं के लिए ग्राहक ढूंढने का काम करते हैं.


बाड़मेर में सामंती प्रवृत्ति काफी पुरानी है.पुराने समय में जमींदार और जागीरदारों की अय्याशी के लिए के लिए साटिया जाति की इन साहूकार महिलाओं को गुजरात के कच्छ, भुजम हिम्मतनगर, गांधीधाम आदि से लाकर पश्चिमी राजस्थान के सांवरड़ा, करमावास, सुइली, मजलव लाखेटा आदि गांवों में बसाते थे.


सामंती प्रथा के खत्म होने के बाद इन महिलाओं के लिए मुसीबत खड़ी हो गई. इनके लिए दो वक़्त के भोजन की व्यवस्था कर पाना भी मुश्किल हो गया  . मजबूर होकर इन परिवारों ने जिस्मफरोशी को अपनाया और पिछले 40-45 वर्षों से इसी में लगे हैं.


सांवरड़ा गांव में राजीव गांधी स्वर्ण जयंती पाठशाला भी खोली गई है. इसमें लगभग 28 छात्राओं का एडमिशन हुआ है, लेकिन इन छात्राओं की उपस्थिति 13 -14  से ज्यादा नहीं होती. यहां की वेश्याओं का मानना है कि जब वेश्यावृत्ति ही करनी है तो पढ़ने-लिखने से क्या लाभ.



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